राजस्थान की सगुण भक्ति धारा, शैव मत, नाथ सम्प्रदाय ( पंथ ) (rajasthan ki sahgun bhakti dhara, shev mat, nath sampradaay (panth)

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नाथ सम्प्रदाय ( पंथ ) (nath sampradaay (panth)

नाथ सम्प्रदाय
नाथ सम्प्रदाय

नाथपंथ शैव मत ( सम्प्रदाय ) की एक शाखा है , जिसका प्रारम्भ पूर्व मध्यकाल में हुआ । इसके प्रवर्तक ‘ नाथमुनि माने जाते हैं । गुरु गोरखनाथ , मत्स्येन्द्रनाथ , गोपीचन्द्र , भर्तृहरि , चिड़ियानाथ , जलधरनाथ , आयस देवनाथ आदि प्रमुख नाथ संत हुए हैं । गुरु गोरखनाथ को शिव का अवतार मानकर शिव गोरक्ष ‘ कहा जाता है । राजस्थान में जोधपुर नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र रहा है । ऐसा माना जाता है कि nath sampradaayजालौर का निर्माण करवाया था

तथा मानसिंह के शासनकाल में मारवाड़ में नातों का दबदबा रहा था राजस्थान में नाथ सम्प्रदाय की दो शाखाएँ हैं

पहली बैरागी नाथ ‘ पंथ , जिसकी प्रधान गद्दी राताईंगर ( पुष्कर के निकट ) है ।

दूसरी शाखा माननाथी ‘ का प्रधान केन्द्र महामन्दिर ( जोधपुर ) में वतार के रूप है ।इसके अलावा चिड़ियानाथ जी की धूणी ( पालासणी , जिला हैं । ये साधु जोधपुर ) एवं सिरेमन्दिर ( जालौर ) नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्र नरबलि में रहते इस सम्प्रदाय का अभिवादन वाक्य ‘ जै नाथ जी री ( की ) ‘ है

1.संत लालदास जी एवं लालदासी सम्प्रदाय (sant laladas ji avm laldasi sampradaay)


2.जाम्भोजी ( गुरु जंभेश्वर ), विश्नोई सम्प्रदाय (jambhoji (guru jambheshvar), vishnoi sampradaay)


3.संत दादूदयाल एव दादू पथ, संत दादूदयाल की समाधि (sant dadudayal avm dadu panth, sant dadudayal ki samadhi)


शैव मत (shev mat)

भगवान शिव की आराधना करने वाले शैव कहलाते हैं । शिव की पूजा आदिकाल से होती आ रही है ।

विभिन्न प्राचीन सभ्यताओं में शिव के विभिन्न रूपों की पूजा के अवशेष मिले हैं ।

मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन से पूर्व तक शैव सम्प्रदाय ( धर्म ) के चार मत प्रचलित थे — कापालिक , पाशुपत , लिंगायत एवं काश्मीरक । इनमें से प्रथम दो मतों का प्रभाव राजस्थान में भी रहा ।

कापालिक सम्प्रदाय (kapalika sampradaay)

कापालिक सम्प्रदाय में ‘ भैरव ‘ की पूजा शिव के अवतार के रूप में की जाती है । इस सम्प्रदाय के साध तांत्रिक होते हैं । ये साधु | गले में मुण्डमाल पहनते हैं , सुरापान करते हैं तथा इनमें नरबलि का नैवेद्य भी प्रचलित है । कापालिक साधु सामान्यत : श्मशान में रहते हैं । कापालिक साधुओं को अघोरी बाबा ‘ भी कहा जाता है । पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक दण्डधारी लकुलीश को माना जाता है । इस सम्प्रदाय के साधु भगवान शिव की पूजा दिन में अनेक बार करते हैं तथा हाथ में दण्ड धारण करते हैं । हर्षपर्वत ( सीकर ) पर मिले 975 ई . के एक शिलालेख में इस सम्प्रदाय के साधु गुरु विश्वरूप का वर्णन मिलता है ।

मध्यकाल के पश्चात् राजस्थान में शैव मत के विभिन्न सम्प्रदायों का उदय हुआ ।

इनमें नाथ , नागा , निहंग , सिद्ध , खाकी एवं जसनाथी प्रमुख हैं ।

वैसे तो इस मत का प्रचलन सम्पूर्ण राजस्थान में है

तथापि मेवाड़ क्षेत्र में हारीत ऋषि के प्रभाव से एकलिंग जी ‘ मेवाड़ के अधिपति ‘ माने जाते हैं । उनके शिष्यों को 17वीं शताब्दी तक मेवाड़ के शासकों ने राजगुरु का सम्मान दिया ।

बाद में मेवाड़ के महाराणा वैष्णव मत के प्रभाव में आ गये ।

1.गौड़ीय सम्प्रदाय (ब्रह्म सम्प्रदाय), वल्लभ सम्प्रदाय (पुष्टिमार्गीय), विट्ठलनाथ जी के पुत्र (godiya sampradaay(brahaman sampradaay), vallabha sampradaay(pustimargiya), vitalanath ji ke putra)


2.राजस्थान के रामस्नेही सम्प्रदाय, संत दरियावजी रेण शाखा (rajasthan ke ramsanehi sampradaay, sant dariyavaji ren shakha)


3.संत रामचरण जी, हरिराम दास जी, संत रामदास जी (sant ramcharn ji, hariram das ji, sant ramdas ji)


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