नागभट्ट द्वितीय nagbhat divatiye :-

भगवती देवी की भक्ति के लिए नागभट्ट द्वितीय प्रसिद्ध है ।
– चन्द्रप्रभ सूरि द्वारा रचित ‘ प्रभावक चरित्र के अनुसार नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु 23 अगस्त , 833 ई . में हुई थी।० नागभट्ट द्वितीय के पश्चात् रामभद्र व भोजदेव प्रतिहार की इस शाखा के शासक बने । 843 ई . से 881 ई . के मध्य के भोजदेव के शिलालेखों से इसके शासनकाल की जानकारी मिलती है । भोजदेव के समय के चाँदी और ताँबे के सिक्के जिन पर ‘ श्रीमदादिवराह ‘ ( श्रीमद् आदिवराह ) लिखित में उपस्थित है नागभट्ट द्वितीय का उत्तराधिकारी महेन्द्रपाल हुआ जिसके समय के 893- 909 ई . के ताम्रपत्र मिलते हैं जिससे उसके राज्य विस्तार की सीमा काठियावाड़ तक होना प्रमाणित होती है
– जिसमें परम्परागत राजस्थान भी शामिल है ।
– महेन्द्रपाल के गुरु राजशेखर की रचनाओं ‘ कर्पूर मंजरी , विशाल मंजिका बाल रामायण आदि से उनके समय के सामाजिक व शैक्षणिक स्तर का बोध होता है | महेंद्रपाल का उत्तराधिकारी महिपाल हुआ | जिसके 914 ई . व 917 ई . के दानपात्र उपस्थित हैं | महिपाल के पश्चात् शासक बने भोज विनायकपाल के समय में कन्नौज के प्रतिहारों की स्थिति दुर्बल रही जिसके फलस्वरूप उनके राजधानी सामन्त स्वतंत्र होने का प्रयत्न करने लगे ।
– राजोगढ़ के गुर्जर प्रतिहार rajogadh ke gujar pratihar :-
भोज विनायकपाल के पुत्र महेन्द्रपाल द्वितीय ने अपने पिता की खोई हुयी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त का प्रयास किया । इसके समय के प्रतापगढ़ के लेख ( 946 ई . ) से ज्ञात होता है कि छोटार्सी का चौहान शासन उसका सामान्त था । महेन्द्रपाल द्वितीय के पश्चात् देवपाल शासक हुआ जिसके समय के शिलालेख में उसके द्वारा परमभट्टारक , महाराजाधिराज और परमेश्वर के विरुद्ध से विभूषित होने की जानकारी विस्तृत मिलती है । प्रतिहार देवपाल के पौत्र राज्यपाल के समय महमूद गजनवी के आक्रमण से प्रतिहारों की शक्ति को दुर्बल – वह निरस्त कर दिया गया ।
अन्त में लगभग 1093 ई . के आसपास चन्द्रदेव गहड़वाल ने प्रतिहारों से कन्नौज से छीन लिया गया |
जालौर, उज्जैन, कन्नौज और वत्सराज प्रतिहार (jalore, ujjain, kannauj or watsaraj pratihar)
राजोगढ़ ( अलवर ) के शिलालेख ( 960 ई . ) से ज्ञात होता है । कि तत्कालीन समय में रायपुर ( राजोगढ़ ) पर प्रतिहार गौत्र जन्म गुर्जर सावट के पुत्र मथन देव का राज्य था जो कन्नौज के रघुवंशी नोक कहा प्रतिहार का शासक था । मंथन देव को ‘ महाराजाधिराज या । इसके परमेश्वर ‘ की उपाधि प्राप्त थी , इससे ज्ञात होता है कि वह अस्ति तथा मंथनदेव महिपाल के बड़े सामन्तों में से एक था । राजोगढ़ के इस शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि उस द्वितीय ने समय यहाँ भी गुर्जर जाति के किसान भी रहते थे । इनमें नागभट्ट ढूंढाड व माचेड़ी के गुर्जर बडगूजर कहलाते थे ।
– बहलोद दान द्वारा लोदी के आक्रमण के समय राजोगढ़ में बडगूजरों का रहना प्रमाणित होता था
– फिरोजशाह तुगलक के आक्रमण के समय – माचेडी पर गोगादेव बडगूजर का राज्य था ।
मण्डोर के प्रतिहार राजवश (mandhor ke partihar rajvansh)
राजस्थान के प्रतिहार राजवश (rajasthan ke partihar rajvansh)
राजस्थान के प्रमुख राजवंश – अग्निकुण्ड, ब्राह्मण, सूर्य व चन्द्रवंशी राजवंश (rajasthan ke pramuk rajvansh – agnikund, bhrahamn, surye v chandravanshi rajvansh)