गवरी लोकनाट्य, तमाशा लोकनाट्य (gavari locknatkiya, tamasha locknatkiya)

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गवरी लोकनाट्य (gavari locknatkiya)

गवरी  लोकनाट्य
गवरी लोकनाट्य

मेवाड़ में प्रचलित भीलों का लोकनाट्य जो श्रावण – भाद्रपद में 40 दिनों तक खेला जाता है । इसकी मुख्य विशेषता इसका दिन में खेला जाना है । शिव – भस्मासुर की कथा पर आधारित गवरी लोकनाट्य सबसे प्राचीन लोकनाट्य माना जाता है अतः इसे ‘ लोकनाट्यों का मेरुनाट्य कहते हैं । बणजारा , ‘ मियांबड ‘ , कान गूजरी , नट – नटनी , खेतड़ी , बादशाह | की सवारी . खेडलिया भूत आदि गवरी के प्रमुख प्रसंग है । गवरी का महानायक एक वृद्ध ( बुड़िया ) है जो शिव का अवतार माना जाता है । इसके अतिरिक्त दो राईयाँ ( पार्वती ) , कुटकुटिया ( मुख्य सूत्रधार ) , पाट भोपा , गवरी के पात्र होते हैं , अन्य सभी ‘ खेल्ये ‘ कहलाते हैं जो एक बस के चारों ओर गोल – गोल घुमका नृत्य करते हैं । गवरी के विभिन्न प्रसंगों को मूल कथानक से जोड़ने के लिए बीच बीच में किया गया सामूहिक नृत्य गवरी की घाई ‘ कहलाता है ।

बना के कान गुजरी खेल में मंजीरे व चिमटे तथा अन्य खेलों में थाली में मांदल का प्रयोग किया जाता है ।

गवरी लोकनाट्य के दौरान गौरच्या माता की पूजा की जाती है ।

घाडावत व वलखण गवरी के अन्तिम पर्व हैं ।

गवरी लोकनाट्य में झामट्या नामक एक पात्र कविता बोलता है ।

खट्कड्या ( कुटकुटिया ) इसका दोहरान करता है जो कि जोकर की भूमिका निभाता है

1.राजस्थान के लोकनाट्य – ख्याल लोकनाट्य, रम्मत लोकनाट्य (rajasthan ke locknatkiya – khyala locknatkiya, rammat locknatkiya)


2.राजस्थान के मुस्लिम संत एवं पीर, ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (rajasthan ke mushilam santn avm pir, khvaja muinnudin chishti)

तमाशा लोकनाट्य (tamasha locknatkiya)

जयपुर का तमाशा लोकनाट्य में अपना विशिष्ट ज्ञान रखता है । अखाड़ा जिसका विकास जयपुर के भट्ट परिवार ने किया । इसके मुखिया कर उसे बंशीधर भट्ट ( महाराष्ट्र ) को जयपुर महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने गुणीजन खाने में स्थान देकर प्रोत्साहन दिया । सफागू बंशीधर भट्ट की इस विधा को फूलजी भट्ट ( उस्ताद ) , गोपीकृष्ण भट्ट ( गोपीजी ) तथा वासुदेव भट्ट आगे बढ़ाकर वर्तमान में जीवित रखे हुए हैं । भट्ट परिवार ने तमाशा में जयपुरी ख्याल व ध्रुपद गायकी का समावेश कर बुलन्दियों तक पहुँचाया तमाशा में संगीत , नृत्य व गायन तीनों की प्रधानता होती है । डरी इसके संवाद काव्यमय होते हैं

तथा संवाद व संगीत राग रागनियों से निबद्ध होता है । तमाशा का मंच ‘ अखाड़ा ‘ कहलाता है ।

तमाशे में जयपुरी ख्याल की भांति स्त्रियों की भूमिका का अभिनय स्त्रियाँ ही करती हैं ।

तमाशा नाट्य में जोगी – जोगन , छैला पणिहारी , जूठनमियों , हीर – राँझा आदि का मंचन होता है ।

1.मीरा बाई, मीरा का विवाह (mira bai, mira ka vivaha)


2.राजस्थान के व्यवसायिक लोक नृत्य, तेरहताली, कच्छी घोडी, भवाई (rajasthan ke vyaavasaayik lock nartya, terahatali, kachchhi ghodi, bhavai)


3.शाक्त मत, वैष्णव सम्प्रदाय (shakta mat, veshnava sampradaay)


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