रूठी रानी का महल कहाँ पर स्थित है?

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रूठी रानी का महल कहाँ पर स्थित है?

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रूठी रानी का महल कहाँ पर स्थित है?

Rajasthan History (राजस्थान इतिहास) से संबन्धित अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

बीकानेर के रायसिंह का विद्रोही पुत्र था-
जैता-कुंपा किसके सेनानायक थे
जाटों पर मुगलों की विजय में साथ देने के कारण सवाईं जयसिंह को ‘राज राजेश्वर’ व ‘राजाधिराज’ की उपाधि किसने दी
जीज मुहम्मदशाही‘ व ‘जयसिंह कारिका‘ नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की
विजयसिंह पथिक ने उपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना कब की थी
बिजौलिया आंदोलन किस वर्ष प्रारम्भ हुआ
क्रांति के दौरान एक मात्र शासक कौन थे, जिन्होंने अंग्रेजों की सहायता की तथा राज्य तथा राज्य के बाहर पंजाब तक विद्रोहियों का दमन किया
निम्बाहेड़ा पर अधिकार करने में अंग्रेजों की मदद किस राज्य की सेना ने की-
कोटा में विद्रोह कब प्रारंभ हुआ

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राजस्थान के प्रमुख महल, रूठी रानी का महल. जयसमंद (उदयपुर). 50. रूठी रानी का महल. जोधपुर (मालदेव द्वारा अपनी रानी उमादे के लिए निर्मित). 51. फूल महल पैलेस. किशनगढ़ (अजमेर). 52. देवगढ़ महल. देवगढ़ (राजसमन्द). 53. दीपक महल. नागौर. 54. रानी महल. नागौर. 55. अमर सिंह महल, रूठी रानी का महल इस झील के निकट की एक पहाड़ी पर स्थित है—- A. पिछोला झील B. राज़समंद झील C. जयसमंद D. फतेह सागर झील, जगत प्रसिद्ध रूठी रानी का महल राजसमंद, रूठी रानी का महल कहाँ है, रानी उमादे, रूठी रानी का महल कहां है ? ,रूठी रानी का महल उदयपुर, रूठी रानी उपन्यास, रूठी रानी की छतरी, राजस्थान की रूठी रानी, दासी भारमली

 

19 thoughts on “रूठी रानी का महल कहाँ पर स्थित है?”

  1. जोधपुर। राजस्थान के राजवंशों के गौरवशाली इतिहास के साथ इनके किस्से भी बड़े रोचक हैं। बात राजा मालदेव की शादी के समय की है। रानी उमादेसुहाग की सेज पर राजा का इंतजार करती रही और वो पहुंचे ही नहीं। रानी ने राजा को बुला लाने के लिए दासी को भेजा। राजा ने दासी को रानी समझ उसे अपने पास बैठा लिया, ये देख रानी गुस्सा हो गई और राजा से जिंदगी भर बात नहीं की। जब राजा रानी को मनाने पहुंचे तो उमादे ने कहा कि अब आप मेरे लायक नहीं रहे। जानें क्या है पूरी कहानी… Dainikbhaskar.com जानों राजस्थान सीरीज के तहत यहां के राज परिवारों की कही अनकही कहानियां बता रहा है। इसी कड़ी में आज पढ़िए मारवाड़ के राजा राव मालदेव की एक रानी की कहानी… एक गलती पड़ी भारी पांच सदी पूर्व मारवाड़ में राजा राव मालदेव थे।इनकी एक गलती के कारण उनका नई रानी उनसे रूठ गई थीं। रानी ने भी ऐसा प्रण लिया कि जीवनभर अपनी बात पर कायम रही और इतिहास में रूठीं रानी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। जीवनभर अपने पति से नहीं बोलने वाली रूठी रानी ने मरने के बाद अपने पति का साथ दिया और उसके साथ ही सती हो गई। कुछ ऐसी है पूरी कहानी – पूरे राजपूताना में आज तक राव मालदेव की टक्कर का अन्य कोई राजपूत शासक नहीं हुआ। जीवन में 52 युद्ध लड़ने वाले इस शूरवीर की शादी 24 वर्ष की आयु में वर्ष 1535 में जैसलमेर की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ। – उमादे अपनी सुंदरता व चतुरता के लिए प्रसिद्ध थी। राठौड़ राव मालदेव की बरात शाही लवाजमे के साथ जैसलमेर पहुंची। राजकुमारी उमादे राव मालदेव जैसा शूरवीर और महाप्रतापी राजा को पति के रूप में पाकर बहुत खुश थी। – शादी होने के बाद राव मालदेव अपने सरदारों व संबंधियों के साथ महफिल में बैठ गए और रानी उमादे सुहाग की सेज पर उनकी राह देखती-देखती थक गई। – इस पर रानी ने दहेज में मिली अपनी खास दासी भारमली को राजा को बुलाने भेजा। दासी भारमली राव मालदेव को बुलाने गई। खूबसूरत दासी को नशे में चूर राव ने रानी समझ कर अपने पास बैठा लिया। – काफी वक्त गुजरने के बाद भी भारमली के न आने पर रानी जब राव के कक्ष में गई तो वहां भारमली को उनके आगोश में देखा। इससे नाराज हो उमादे ने राव के स्वागत के लिए तैयार किया आरती का थाल वहीं यह कह उलट दिया कि अब राव मेरे लायक नहीं रहे। – सुबह राव मालदेव नशा उतरा तब वे बहुत शर्मिंदा हुए और रानी के पास गए, लेकिन तब तक वह रानी उमादे रूठ चुकी थी। कभी नहीं मिली राजा से, लेकिन उनके साथ हो गई सती – ये रानी आजीवन राव मालदेव से रूठीं ही रही और इतिहास में रूठीं रानी के नाम से मशहूर हुई। इस रानी के लिए किले की तलहटी में एक अलग महल भी बनवाया गया, लेकिन वह वहां भी कुछ दिन रह कर वापस लौट गई। – जब शेरशाह सूरी ने मारवाड़ पर आक्रमण किया तो रानी से बहुत प्रेम करने वाले राव मालदेव ने युद्ध में प्रस्थान करने से पूर्व एक बार उनसे मिलने का अनुरोध किया। एक बार मिलने को तैयार होने के बाद रानी उमादे ने ऐन वक्त पर मिलने से इनकार कर दिया। – इतिहासकार यह भी मानते है कि रूठी रानी के मिलने से इनकार करने का राव मालदेव पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और वह अपने जीवन में पहली बार कोई युद्ध हार गया। – वर्ष 1562 में राव मालदेव के निधन का समाचार मिलने पर रानी उमादे को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्हें बहुत कष्ट पहुंचा। राव मालदेव से बहुत प्रेम करने वाली रानी उमादे प्रायश्चित के रूप में उनकी पगड़ी के साथ स्वयं को अग्नि को सौंप सती हो गई।

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  2. रूठी रानी का महल तारागढ़(अजमेर) रानी उमादे मालदेव की रानी।
    दूसरा महल माण्डलगर्ड(भीलवाड़ा)
    तीसरा महल जयसमन्द(उदयपुर)

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